
जौनपुर:शबरी के जूठे बेर से रामराज्य तक, आचार्य शांतनु महाराज ने सुनाए श्रीराम के आदर्शों के प्रेरक प्रसंग नौ दिवसीय श्रीरामकथा के अंतिम दिन भक्ति, समता, त्याग और मर्यादा का दिया संदेश, आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह ने श्रद्धालुओं का जताया आभार
जौनपुर:शबरी के जूठे बेर से रामराज्य तक, आचार्य शांतनु महाराज ने सुनाए श्रीराम के आदर्शों के प्रेरक प्रसंग
नौ दिवसीय श्रीरामकथा के अंतिम दिन भक्ति, समता, त्याग और मर्यादा का दिया संदेश, आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह ने श्रद्धालुओं का जताया आभार
जौनपुर ( उत्तरशक्ति )। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में आयोजित नौ दिवसीय श्रीरामकथा के अंतिम दिन गुरुवार को कथाव्यास परम पूज्य आचार्य शांतनु जी महाराज ने श्रीरामचरितमानस के विभिन्न प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने शबरी प्रसंग, सुग्रीव से मित्रता, बाली वध, हनुमान जी की भक्ति, लंका विजय और भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, समता, त्याग, समर्पण और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। कथा के दौरान पूरा पंडाल भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा और श्रद्धालु श्रीराम के जयकारे लगाते रहे।
आचार्य शांतनु महाराज ने शबरी प्रसंग का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर स्वीकार कर समाज को समानता और प्रेम का संदेश दिया। प्रभु श्रीराम ने कभी जाति-पाति और ऊंच-नीच के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं किया। उनके लिए भक्त का प्रेम और समर्पण ही सर्वोपरि था। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति के लिए धन, वैभव और दिखावे की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मन में श्रद्धा, विश्वास और निष्कपट प्रेम होना चाहिए। शबरी की भक्ति इस बात का प्रमाण है कि निर्मल हृदय से की गई साधना पर भगवान अवश्य कृपा करते हैं।
सुग्रीव और बाली के प्रसंग का उल्लेख करते हुए महाराज ने कहा कि किष्किंधा के राजा बाली के पास अपार शक्ति थी, लेकिन अहंकार और अधर्म ने उसे विनाश की ओर पहुंचा दिया। भगवान श्रीराम ने सुग्रीव से मित्रता कर उसे न्याय दिलाने में सहायता की। इस प्रसंग से सीख मिलती है कि सच्ची मित्रता वही है, जो संकट के समय साथ खड़ी रहे। मनुष्य को अपनी शक्ति का उपयोग दूसरों को दबाने के लिए नहीं, बल्कि धर्म और न्याय की रक्षा के लिए करना चाहिए।
हनुमान जी की भक्ति और पराक्रम का वर्णन करते हुए आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि सुंदरकांड हमें आत्मविश्वास, साहस और प्रभु के प्रति अटूट विश्वास की प्रेरणा देता है। हनुमान जी ने भगवान श्रीराम के कार्य को अपना कर्तव्य मानकर समुद्र पार किया और माता सीता का पता लगाया। उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति के मन में दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास और ईश्वर के प्रति विश्वास होता है, तो बड़ी से बड़ी बाधा को पार करना संभव हो जाता है। यह प्रसंग विशेष रूप से युवाओं को अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा देता है।
लंका विजय के प्रसंग में महाराज ने रावण के चरित्र का उल्लेख करते हुए कहा कि रावण चारों वेदों का ज्ञाता और अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन उसके अहंकार, अधर्म और अनुचित आचरण ने उसके पूरे साम्राज्य का विनाश कर दिया। ज्ञान और शक्ति तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग सही दिशा में किया जाए। अहंकार मनुष्य के विवेक को समाप्त कर देता है, जबकि विनम्रता और धर्म का मार्ग उसे सम्मान दिलाता है। भगवान श्रीराम की विजय सत्य, धर्म और मर्यादा की विजय का प्रतीक है।
भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने और राज्याभिषेक के प्रसंग का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि चौदह वर्ष का वनवास पूरा करने के बाद प्रभु श्रीराम के अयोध्या आगमन पर लोगों में आनंद की लहर दौड़ गई। उनके राज्याभिषेक के साथ रामराज्य की स्थापना हुई, जो न्याय, समानता, कर्तव्यनिष्ठा, लोककल्याण और आदर्श शासन का प्रतीक है। श्रीराम का जीवन सिखाता है कि व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना चाहिए।
आचार्य शांतनु महाराज ने कहा कि श्रीरामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाने वाला मार्गदर्शक है। भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपनाकर समाज में प्रेम, सद्भाव, भाईचारा और नैतिक मूल्यों को मजबूत किया जा सकता है। वर्तमान पीढ़ी को श्रीराम के जीवन से प्रेरणा लेकर अपने आचरण में मर्यादा, सेवा और संस्कारों को स्थान देना चाहिए।
आयोजक ज्ञान प्रकाश सिंह ने कहा कि नौ दिवसीय श्रीरामकथा का मुख्य उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों, भारतीय संस्कृति और सनातन परंपराओं के गौरवशाली संदेश को जन-जन तक पहुंचाना है। उन्होंने कहा कि आज की नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक मूल्यों से जोड़ना आवश्यक है। श्रीरामकथा जैसे आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना जागृत करने के साथ ही लोगों को नैतिकता, सेवा और सदाचार का मार्ग दिखाते हैं।
कथा के समापन अवसर पर ज्ञान प्रकाश सिंह ने आयोजन में शामिल सभी श्रद्धालुओं, संत-महात्माओं और सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने विनम्र भाव से कहा कि भगवान की महिमा के बिना ऐसी कथा का आयोजन संभव नहीं है। वे स्वयं को प्रभु का एक तुच्छ सेवक मानते हैं और भगवान की कृपा से ही यह आयोजन सफल हो सका। उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने की अपील की।
इस अवसर पर जनपद के विभिन्न क्षेत्रों से आए श्रद्धालुओं सहित अनेक गणमान्य लोग उपस्थित रहे। नौ दिनों तक चले इस धार्मिक आयोजन ने क्षेत्र में भक्तिमय वातावरण बनाए रखा और श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाने का संदेश दिया।