
जौनपुर:राम-भरत मिलाप प्रसंग सुन भावुक हुए श्रद्धालु, शांतनु जी महाराज ने बताया त्याग और भ्रातृप्रेम का महत्व
जौनपुर:राम-भरत मिलाप प्रसंग सुन भावुक हुए श्रद्धालु, शांतनु जी महाराज ने बताया त्याग और भ्रातृप्रेम का महत्व
भरत जी ने श्रीराम की चरण पादुका को बनाया अयोध्या का राजचिह्न, नंदीग्राम में तपस्वी जीवन बिताकर 14 वर्षों तक की बड़े भाई की प्रतीक्षा
जौनपुर ( उत्तरशक्ति )। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज प्रांगण में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के आठवें दिन पूज्य कथा व्यास शांतनु जी महाराज ने राम-भरत मिलाप के प्रसंग का भावपूर्ण वर्णन किया। कथा के दौरान उन्होंने भगवान श्रीराम और भरत जी के बीच अटूट प्रेम, त्याग, समर्पण और मर्यादा का ऐसा चित्रण प्रस्तुत किया कि पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। महाराज ने कहा कि राम-भरत मिलाप केवल दो भाइयों के मिलन की कथा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में आदर्श पारिवारिक संबंधों, कर्तव्य और त्याग का अनुपम उदाहरण है।
पिता के निधन और श्रीराम के वनवास से दुखी हुए भरत
शांतनु जी महाराज ने कथा में बताया कि जब भगवान श्रीराम माता सीता और लक्ष्मण जी के साथ चौदह वर्ष के वनवास पर चले गए, तो उनके वियोग में महाराज दशरथ ने प्राण त्याग दिए। उस समय भरत जी अपने ननिहाल में थे। अयोध्या लौटने पर जब उन्हें पिता के निधन और बड़े भाई श्रीराम के वनवास की जानकारी मिली, तो वे गहरे शोक में डूब गए।
भरत जी ने माता कैकेयी से अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा कि उनके लिए राज्य और राजसिंहासन से बढ़कर बड़े भाई श्रीराम का प्रेम और सम्मान है। उन्होंने कभी भी अपने भाई को वनवास दिलाकर राजगद्दी प्राप्त करने की इच्छा नहीं रखी थी। पिता के निधन और श्रीराम से बिछड़ने के दुख ने उन्हें व्याकुल कर दिया। भरत जी ने तत्काल श्रीराम को वापस अयोध्या लाने का संकल्प लिया।
श्रीराम को वापस लाने के लिए वन पहुंचे भरत
कथा व्यास ने बताया कि भरत जी गुरुजनों, मंत्रियों, माताओं और अयोध्या के अनेक नागरिकों के साथ श्रीराम को मनाने के लिए वन की ओर चल पड़े। उनके मन में राज्य प्राप्त करने का कोई लोभ नहीं था। वे चाहते थे कि श्रीराम अयोध्या लौटकर राजकाज संभालें और उनके स्थान पर वही राजा बनें, जिनका राज्य पर वास्तविक अधिकार था।
जब लक्ष्मण जी ने भरत को विशाल सेना के साथ अपनी ओर आते देखा, तो उन्हें आशंका हुई कि कहीं भरत राज्य की सत्ता अपने हाथ में रखने के उद्देश्य से तो नहीं आ रहे हैं। लक्ष्मण जी के मन में क्रोध उत्पन्न हुआ, लेकिन भगवान श्रीराम ने उन्हें समझाया कि भरत के हृदय में उनके प्रति अपार स्नेह है। वे किसी बुरी भावना से नहीं, बल्कि प्रेमवश उनसे मिलने आ रहे हैं। श्रीराम ने भरत के चरित्र और उनके निश्छल प्रेम पर विश्वास व्यक्त किया।
दोनों भाइयों का मिलन देख भावुक हुए उपस्थित लोग
जैसे ही भरत जी ने भगवान श्रीराम को देखा, वे स्वयं को रोक नहीं सके और दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़े। श्रीराम ने भी भरत को उठाकर हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों के नेत्रों से अश्रुधारा बहने लगी। इस भावपूर्ण मिलन को देखकर गुरुजन, माताएं और वहां उपस्थित अन्य लोग भी भावुक हो उठे।
शांतनु जी महाराज ने कहा कि राम-भरत मिलाप हमें सिखाता है कि सच्चे रिश्तों में स्वार्थ का कोई स्थान नहीं होता। जहां प्रेम, विश्वास और समर्पण होता है, वहां सत्ता और संपत्ति का महत्व गौण हो जाता है। भरत जी ने अपने आचरण से यह सिद्ध किया कि बड़े भाई के प्रति सम्मान और परिवार के प्रति कर्तव्य किसी भी सांसारिक सुख से बढ़कर हैं।
पिता के वचन का पालन करने पर अडिग रहे श्रीराम
भरत जी ने भगवान श्रीराम से बार-बार अयोध्या लौटने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि आपके बिना अयोध्या सूनी है और राज्य का संचालन आपके बिना अधूरा है। इसलिए आप वापस चलकर राजसिंहासन संभालिए। लेकिन श्रीराम ने भरत को समझाया कि पिता महाराज दशरथ ने उन्हें चौदह वर्ष के वनवास का वचन दिया है। पिता की आज्ञा का पालन करना उनका धर्म है और वे किसी भी परिस्थिति में अपनी मर्यादा से पीछे नहीं हट सकते।
श्रीराम की धर्मनिष्ठा और मर्यादा का सम्मान करते हुए भरत जी ने अंततः उनकी चरण पादुका मांगी। भगवान श्रीराम ने अपनी चरण पादुका उन्हें सौंप दी। भरत जी ने श्रद्धापूर्वक पादुका को अपने सिर पर धारण किया और अयोध्या लौटने का निर्णय लिया। यह प्रसंग दर्शाता है कि भरत जी के लिए राजसत्ता से अधिक महत्वपूर्ण श्रीराम का सम्मान और उनके प्रति समर्पण था।
नंदीग्राम में रहकर 14 वर्षों तक की श्रीराम की प्रतीक्षा
कथा व्यास ने आगे बताया कि अयोध्या लौटने के बाद भरत जी ने भगवान श्रीराम की चरण पादुका को राजसिंहासन पर स्थापित किया। उन्होंने स्वयं राजा की तरह सुख-सुविधाओं का उपभोग करने के बजाय नंदीग्राम में रहकर तपस्वी जीवन बिताने का संकल्प लिया। वे श्रीराम के प्रतिनिधि के रूप में राज्य के कार्यों का संचालन करते रहे और चौदह वर्षों तक अपने बड़े भाई की वापसी की प्रतीक्षा करते रहे।
भरत जी का जीवन त्याग, सेवा और कर्तव्यनिष्ठा की मिसाल है। उन्होंने यह संदेश दिया कि अधिकार मिलने के बावजूद व्यक्ति को मर्यादा और नैतिकता का पालन करना चाहिए। उनका चरित्र आज भी समाज को पारिवारिक एकता, भाईचारे और निःस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है।
शांतनु जी महाराज ने श्रद्धालुओं से रामायण के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीराम की मर्यादा और भरत जी का त्याग परिवारों में प्रेम, समाज में सद्भाव और जीवन में नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का संदेश देता है।
कथा में गणमान्य लोगों की रही उपस्थिति
बीआरपी इंटर कॉलेज परिसर में आयोजित श्रीराम कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। इस अवसर पर रीता बहुगुणा, पूर्व सांसद धनंजय सिंह, राज्यसभा सांसद साधना सिंह (चंदौली), अमरजीत सिंह (मुंबई), हरिकेश प्रताप सिंह, जगदंबा पाल, रजनीकांत तिवारी, अरुण प्रजापति, प्रमोद सिंह (चंदौली), बृजेश सिंह (कर्मचारी संघ), संतोष सिंह, सत्या विकास सिंह, रोहित सोलंकी, संजीव सिंह (काशी), अभिषेक शुक्ला, भुवनेश्वर सिंह, दीपक सिंह, सुनील सिंह और आशुतोष सिंह बब्लू सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
कथा के दौरान राम-भरत मिलाप के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को भावनात्मक रूप से जोड़ते हुए प्रेम, त्याग, कर्तव्य और मर्यादा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।