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श्रीराम के वनगमन का प्रसंग सुन नम हुईं श्रद्धालुओं की आंखें, भावुक हुआ कथा पंडाल

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राम वनगमन का प्रसंग सुन भावुक हुए श्रोता, श्रद्धालुओं की आंखें छलकीं

बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में चल रही नौ दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें दिन आचार्य शांतनु जी महाराज ने सुनाया राम वनवास का मार्मिक प्रसंग

जौनपुर ( उत्तरशक्ति )। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज मैदान में भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के पांचवें दिन राम वनगमन का मार्मिक प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावुक हो उठे। कथा व्यास आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम के जीवन से जुड़े प्रसंगों का वर्णन करते हुए त्याग, कर्तव्य, सत्य, पारिवारिक प्रेम और मर्यादा का संदेश दिया। कथा के दौरान ऐसा भावपूर्ण वातावरण बना कि अनेक श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।

आचार्य शांतनु जी महाराज ने भगवान श्रीराम और माता सीता के विवाह के बाद अयोध्या आगमन से लेकर उनके राज्याभिषेक की तैयारियों तथा फिर वनवास की परिस्थितियों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि जनकपुर में विवाहोत्सव के बाद जब भगवान श्रीराम, माता सीता और उनके भाई अयोध्या पहुंचे, तो पूरी नगरी में आनंद का वातावरण था। महाराज दशरथ सहित राजपरिवार प्रसन्न था और अयोध्यावासी अपने राजकुमारों के स्वागत में उत्साहित थे।

राज्याभिषेक की खुशियां अचानक शोक में बदलीं

कथा व्यास ने बताया कि अयोध्या में महाराज दशरथ ने भगवान श्रीराम को राजा बनाने का निर्णय लिया था। राजमहल से लेकर नगर की गलियों तक राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं। अयोध्यावासी अपने प्रिय राजकुमार के राजतिलक की प्रतीक्षा कर रहे थे। घर-घर मंगलगीत गाए जा रहे थे और पूरी नगरी उत्सव के रंग में रंगी थी।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। मंथरा के बहकावे में आकर महारानी कैकेयी ने महाराज दशरथ से अपने दो वरदान मांग लिए। उन्होंने भरत के लिए राजगद्दी और भगवान श्रीराम के लिए चौदह वर्ष का वनवास मांगा। कैकेयी की इस मांग ने महाराज दशरथ को भीतर तक झकझोर दिया। जिस पुत्र के राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही थीं, उसी को वन भेजने की बात से राजमहल में शोक छा गया।

आचार्य जी ने इस प्रसंग के माध्यम से बताया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य को अपने वचन, धर्म और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहना चाहिए। महाराज दशरथ के सामने एक ओर पुत्र के प्रति अगाध प्रेम था, तो दूसरी ओर अपने वचन की मर्यादा। इसी द्वंद्व ने उनके जीवन को असहनीय पीड़ा से भर दिया।

श्रीराम ने प्रसन्न मन से स्वीकार किया वनवास

कथा के सबसे भावुक प्रसंग में आचार्य शांतनु जी महाराज ने बताया कि भगवान श्रीराम ने पिता के वचन की रक्षा के लिए बिना किसी विरोध के चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार कर लिया। उनके लिए राजसिंहासन से अधिक महत्वपूर्ण धर्म, सत्य और मर्यादा थी। उन्होंने अपने आचरण से यह संदेश दिया कि सच्चा आदर्श वही है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने कर्तव्य से पीछे न हटे।

माता सीता ने भी श्रीराम के साथ वन जाने का संकल्प लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि पति के बिना राजमहल का सुख उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता। वहीं लक्ष्मण जी ने अपने बड़े भाई की सेवा और सुरक्षा के लिए उनके साथ वन जाने का निर्णय लिया। इस प्रकार तीनों ने राजमहल के सुखों का त्याग कर कठिन वन जीवन को स्वीकार किया।

राम वनगमन के प्रसंग ने श्रद्धालुओं को किया भावुक

आचार्य जी ने वर्णन किया कि जिस अयोध्या में कुछ समय पहले राज्याभिषेक की खुशियां मनाई जा रही थीं, वहीं श्रीराम के वनवास की खबर से मातम जैसा माहौल हो गया। नगरवासी अपने प्रिय प्रभु को रोकना चाहते थे, लेकिन श्रीराम पिता के वचन और धर्म की मर्यादा निभाने के लिए दृढ़ थे।

भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी के अयोध्या से वन की ओर प्रस्थान का प्रसंग सुनकर कथा पंडाल में उपस्थित श्रद्धालु भावुक हो उठे। महाराज दशरथ के पुत्र-वियोग और अयोध्यावासियों के दुख का वर्णन सुनकर श्रोताओं की आंखें नम हो गईं।

कथा व्यास ने कहा कि श्रीराम का जीवन केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं, बल्कि आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति के रूप में जीवन जीने की प्रेरणा भी देता है। राम वनगमन का प्रसंग सिखाता है कि त्याग, धैर्य, सत्य और मर्यादा जैसे मूल्य जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य का मार्गदर्शन करते हैं।

गणमान्य अतिथियों की रही उपस्थिति

श्रीराम कथा में दूर-दराज से आए अनेक गणमान्य अतिथियों ने सहभागिता की। इनमें टीडी कॉलेज के पूर्व अध्यक्ष राजेश सिंह, भाजपा मंत्री गिरीश यादव, आईएएस शिव प्रकाश सिंह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक राजकुमार सिंह, महंत नरसिंह दास, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष मनोज सिंह, भाजपा काशी क्षेत्र के क्षेत्रीय मंत्री अजीत सिंह, डॉ. रामसूरत मौर्य, अमित सिंह, सुमित सिंह, दीपक सिंह, शिव सिंह और भुवनेश्वर सिंह सहित अन्य लोग उपस्थित रहे।

ज्ञान प्रकाश सिंह के नेतृत्व में आयोजित इस धार्मिक आयोजन में प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर श्रीराम कथा का श्रवण कर रहे हैं। कथा के माध्यम से भगवान श्रीराम के आदर्शों, भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और समाज में नैतिकता के महत्व का संदेश दिया जा रहा है।

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