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जौनपुर:बीआरपी इंटर कॉलेज में श्रीराम जन्मोत्सव का प्रसंग सुन भावुक हुए श्रद्धालु, जय श्रीराम के जयघोष से गूंजा कथा पंडाल

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जौनपुर:बीआरपी इंटर कॉलेज में श्रीराम जन्मोत्सव का प्रसंग सुन भावुक हुए श्रद्धालु, जय श्रीराम के जयघोष से गूंजा कथा पंडाल

शिव-पार्वती संवाद, देवर्षि नारद के प्रसंग और भक्ति की महिमा का पूज्य शांतनु जी महाराज ने किया भावपूर्ण वर्णन

जौनपुर ( उत्तरशक्ति )। नगर के बीआरपी इंटर कॉलेज परिसर में आयोजित श्रीराम कथा के दूसरे दिन भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भावविभोर हो उठे। पूज्य शांतनु जी महाराज के मुखारविंद से श्रीराम जन्म की मंगलमयी कथा सुनकर पूरा कथा पंडाल भक्तिमय हो गया। इस दौरान ‘जय श्रीराम’ और ‘सिया राम, जय राम, जय जय राम’ के जयघोष से वातावरण गूंजता रहा। भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं की भक्ति ने कथा स्थल को आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर कर दिया।

वरिष्ठ भाजपा नेता एवं समाजसेवी ज्ञान प्रकाश सिंह के सौजन्य से आयोजित इस धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु कथा श्रवण के लिए पहुंच रहे हैं। कथा के दौरान महाराज जी ने भगवान श्रीराम के जीवन, उनकी मर्यादा, त्याग, कर्तव्यनिष्ठा और आदर्श आचरण का वर्णन करते हुए श्रद्धालुओं को उनके बताए मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।

शिव-पार्वती संवाद के माध्यम से दिया आध्यात्मिक संदेश

कथा के दौरान पूज्य शांतनु जी महाराज ने भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद का अत्यंत भावपूर्ण वर्णन किया। कैलाश पर्वत पर विराजमान भगवान शिव के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने योग, साधना, आत्मचिंतन और वैराग्य के महत्व को समझाया। महाराज जी ने कहा कि योग और साधना के माध्यम से मनुष्य अपने मन को एकाग्र कर आत्मिक शांति प्राप्त कर सकता है। जीवन में शांति और संतुलन बनाए रखने के लिए व्यक्ति को अपने विचारों तथा व्यवहार पर नियंत्रण रखना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि अहंकार मनुष्य के पतन का प्रमुख कारण है। जब व्यक्ति अपने ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा अथवा उपलब्धियों पर घमंड करने लगता है, तब उसका विवेक प्रभावित होने लगता है। इसके विपरीत विनम्रता, संयम और परोपकार मनुष्य को महान बनाते हैं। भगवान शिव का जीवन त्याग, करुणा, तपस्या और लोककल्याण की प्रेरणा देता है। उनके आदर्शों को अपनाकर मनुष्य अपने जीवन को सार्थक बना सकता है।

महाराज जी ने योग के आठवें अंग समाधि का उल्लेख करते हुए बताया कि साधना की सर्वोच्च अवस्था में साधक का मन गहन एकाग्रता और आध्यात्मिक अनुभूति से जुड़ता है। आध्यात्मिकता केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के विचारों, आचरण और जीवनशैली में भी दिखाई देनी चाहिए।

भक्ति की महिमा सुन भावुक हुए श्रद्धालु

पूज्य शांतनु जी महाराज ने भगवान और उनकी भक्ति की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि सच्ची भक्ति के लिए श्रद्धा, धैर्य, समर्पण और निरंतर साधना आवश्यक है। जब भक्त निर्मल हृदय से प्रभु का स्मरण करता है, तब उसके जीवन में प्रेम, करुणा और सकारात्मकता का संचार होता है।

कथा के दौरान भक्ति रस में डूबे श्रद्धालु भावुक हो उठे। भगवान श्रीराम के प्रति उनकी आस्था और समर्पण का दृश्य देखते ही बन रहा था। जय श्रीराम के उद्घोष और भजनों के बीच पूरा परिसर राममय हो गया।

महाराज जी ने समझाया कि प्रभु की प्राप्ति केवल बाहरी आडंबर से नहीं, बल्कि निर्मल मन, सच्चे आचरण और अटूट विश्वास से होती है। सच्ची भक्ति मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रखने और सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। जो व्यक्ति अपने जीवन में प्रेम, सेवा, सद्भाव और करुणा को स्थान देता है, वही भक्ति के वास्तविक अर्थ को समझ पाता है।

देवर्षि नारद के प्रसंग से समझाया अहंकार का परिणाम

कथा के दौरान देवर्षि नारद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए शांतनु जी महाराज ने अहंकार के दुष्परिणामों को विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि जब व्यक्ति अपनी प्रशंसा सुनकर स्वयं को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है, तब उसका विवेक कमजोर पड़ने लगता है। देवर्षि नारद के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने भगवान श्रीहरि की लीला और अहंकार के निवारण का संदेश दिया।

महाराज जी ने कहा कि प्रशंसा मिलने पर व्यक्ति को और अधिक विनम्र तथा सावधान होना चाहिए। प्रशंसा को अपनी महानता का प्रमाण मानने के बजाय आत्ममंथन और जिम्मेदारी निभाने का अवसर समझना चाहिए। अहंकार व्यक्ति की उपलब्धियों को भी कमजोर कर सकता है, जबकि विनम्रता उसे सम्मान और सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।

उन्होंने कहा कि जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ता है और धर्म की मर्यादा संकट में पड़ती है, तब भगवान विभिन्न रूपों में अवतरित होकर धर्म की स्थापना और मानवता के कल्याण का संदेश देते हैं। भगवान श्रीराम का जीवन मर्यादा, त्याग, सत्य, कर्तव्य और आदर्श आचरण का अनुपम उदाहरण है। उनके जीवन से प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने तथा समाज में सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है।

श्रीराम जन्मोत्सव के प्रसंग से गूंजा कथा पंडाल

भगवान श्रीराम के जन्मोत्सव का प्रसंग आते ही कथा स्थल का वातावरण उल्लास और भक्ति से भर गया। श्रद्धालु मंगलमयी कथा सुनकर भावविभोर हो उठे। जय श्रीराम के जयघोष, भजन और भक्तों की श्रद्धा ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया।

पूज्य शांतनु जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि श्रीराम कथा का वास्तविक उद्देश्य केवल कथा सुनना नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में उतारना है। सत्य, मर्यादा, सेवा, त्याग, प्रेम और विनम्रता को अपनाकर ही व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को धर्म के मार्ग पर चलने, परिवार में संस्कारों को महत्व देने तथा समाज में आपसी प्रेम और सद्भाव बनाए रखने की प्रेरणा दी।

एक करोड़ आठ लाख बार श्रीराम नाम लिखने का संकल्प

इस धार्मिक आयोजन की विशेष बात यह है कि एक करोड़ आठ लाख बार श्रीराम नाम लिखने का संकल्प भी लिया जाएगा। यह संकल्प प्रभु श्रीराम के प्रति श्रद्धा, आस्था और समर्पण का प्रतीक है। श्रीराम नाम के स्मरण और लेखन के माध्यम से श्रद्धालुओं को भक्ति, साधना और आध्यात्मिक चेतना से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।

बीआरपी इंटर कॉलेज परिसर में चल रही श्रीराम कथा के दौरान श्रद्धालुओं की उमड़ती भीड़ और भक्ति का वातावरण लोगों के बीच धार्मिक आस्था का संदेश दे रहा है। कथा के दूसरे दिन श्रीराम जन्मोत्सव का प्रसंग विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण कथा का श्रवण कर भगवान श्रीराम के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

 

 

 

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